(मोक्ष प्राप्ति) कबीर दास जी के दोहे | Kabir das ke dohe in hindi

कबीर के दोहे कक्षा 12 | गुरु के दोहे अर्थ सहित | कबीर दास के 10 दोहे अर्थ सहित | जिंदगी के उद्देश्य पर कबीर जी के दोहे | कबीर दास के दोहे हिंदी में अर्थ।

Kabir Das ke dohe | Kabir das ji ke dohe | kabir ke dohe | Kabir Quotes with meaning | Famous Dohe in Hindi 

कबीर के दोहे कक्षा 12 | गुरु के दोहे अर्थ सहित | कबीर दास के 10 दोहे अर्थ सहित | जिंदगी के उद्देश्य पर कबीर जी के दोहे | कबीर दास के दोहे हिंदी में अर्थ।  Kabir Das ke dohe | Kabir das ji ke dohe | kabir ke dohe | Kabir Quotes with meaning | Famous Dohe in Hindi

Kabir Das ke dohe in Hindi

इस लेख के अंदर हमने Kabir das ke dohe का वर्णन किया है यहां पर हमने कबीर दास के बहुत सारे दोहे बताए हैं और साथ में उन सभी दोहों का मतलब भी बताया है। अगर आप भी कबीर दास के दोहे के बारे में जानकारी लेना चाहते हैं तो आप बिल्कुल सही देना पर आए हैं यहां पर आपको बहुत सारे kabir das ji ke dohe देखने को मिलेंगे आप इन को पढ़ सकते हैं इनका मतलब निकाल सकते हैं और इन को अपने जीवन में उतार सकते हैं। 

आइए जानते हैं कबीरदास के उन सभी दोहों के बारे में जिनका हमने इस लेख में वर्णन किया है कृपया ध्यानपूर्वक पढ़े और समझे।

Kabir das Ke Dohe with meaning

आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत । अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गयी खेत ॥

अर्थ: सुख के समय में भगवान् का स्मरण नहीं किया, तो अब पछताने का क्या फ़ायदा। जब खेत पर ध्यान देना चाहिए था, तब तो दिया नहीं, अब अगर चिड़िया सारे बीज खा चुकी हैं, तो खेद से क्या होगा।

आज कहै मैं काल भजू, काल कहै फिर काल आज काल के करत ही, औसर जासी चाल।

अर्थ : लोग आज कहते हैं कि मैं कल से प्रभु का bhajan करुॅंगा और कल कहतें हैं कि कल से करुॅंगा। इसी आज कल के फेरे में प्रभु के bhajan का अवसर चला जाता है और जीवन व्यर्थ बीत जाता है।

आगि आंचि सहना सुगम, सुगम खडग की धार नेह निबाहन ऐक रास, महा कठिन ब्यबहार।

अर्थ : अग्नि का ताप और talvar की धार सहना आसान है किंतु प्रेम का निरंतर समान रुप से निर्वाह अत्यंत कठिन कार्य है।

आंखि ना देखे बापरा, शब्द सुनै नहि कान सिर के केश उजल भये, आबहु निपत अजान।

अर्थ : मूर्ख अपने aankh से नहीं देख पाते हैं न हीं वे कानों से सुन पाते हैं। सिर के सभी बाल safed हो गये पर वे अभी पूरी मूर्खता में हैं। उम्र से ज्ञान नहीं होता और वे ईश्वर की सत्ता पर visvas नहीं कर पाते हैं।

Kabir Das Ke Dohe in Hindi

आंखो देखा घी भला, ना मुख मेला तेल साधु सोन झगरा भला, ना साकुत सोन मेल।

अर्थ : घी देखने मात्र से ही acha लगता है पर तेल मुॅुह में डालने पर भी अच्छा नहीं लगता है। संतो से झगड़ा भी अच्छा है पर दुष्टों से मेल-मिलाप mitrta भी अच्छा नहीं है।

आपा तजे हरि भजे, नख सिख तजे विकार सब जीवन से निर्भैर रहे, साधू मता है सार ॥

अर्थ: जो व्यक्ति अपने अहम् को छोड़कर, bhagwan कि उपासना करता है, अपने दोषों को त्याग देता है, और किसी जीव-जंतु से बैर नहीं रखता, वह व्यक्ति sadhu के सामान और बुद्धिमान होता है।

आरत कैय हरि भक्ति करु, सब कारज सिध होये करम जाल भव जाल मे, भक्त फंसे नहि कोये।

अर्थ : प्रभु की भक्ति आर्त स्वर में करने से आप के sabhi कार्य सफल होंगे। सांसारिक कर्मों के सभी jaal भक्तों को कभी फाॅंस नहीं सकते हैं। प्रभु भक्तों की सब prakar से रक्षा करते है।

आस करै बैकुंठ की, दुरमति तीनो काल सुक्र कही बलि ना करै, तातो गयो पताल।

अर्थ : स्वर्ग की आशा में उसकी दुष्ट बुद्धि से उसके तीनों samay नष्ट हो गये। उसे गुरु शुक्राचार्य के adesho की अवहेलना के कारण नरक लोक जाना पड़ा।

Sant Kabir das Ke Dohe

आठ पहर यूॅ ही गया, माया मोह जंजाल राम नाम हृदय नहीं, जीत लिया जम काल।

अर्थ : माया मोह अज्ञान भ्रम आसक्ति में संपूर्ण JiVan बीत गया। हृदय में प्र्रभु का नाम bhagti नहीं रहने के कारण मृत्यु के देवता यम ने मनुष्य को जीत लिया है।

आतम अनुभव जब भयो, तब नहि हर्श विशाद चितरा दीप सम ह्बै रहै, तजि करि बाद-विवाद।

अर्थ : जब हृदय में परमात्मा की अनुभुति होती है तो सारे सुख दुख का भेद मिट जाता है। वह किसी chitr के दीपक की लौ की तरह स्थिर हो जाती है और उसके सारे मतांतर समाप्त हो जाते है।

आतम अनुभव ज्ञान की, जो कोई पुछै बात सो गूंगा गुड़ खाये के, कहे कौन मुुख स्वाद।

अर्थ : परमात्मा के ज्ञान का आत्मा में anubhav के बारे में यदि कोई पूछता है तो इसे बतलाना कठिन है। एक गूंगा आदमी गुड़ खांडसारी खाने के बाद उसके swad को कैसे बता सकता है।

आवत गारी एक है, उलटन होय अनेक। कह कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक ॥

अर्थ: अगर गाली के जवाब में gali दी जाए, तो गालियों की संख्या एक से बढ़कर अनेक हो जाती है। कबीर कहते हैं कि यदि गाली को पलटा न जाय, गाली का jawab गाली से न दिया जाय, तो वह गाली एक ही रहेगी ।

Kabir das ke Dohe in hindi

आये है तो जायेगा, राजा रंक फकीर। ऐक सिंहासन चढ़ि चले, ऐक बांधे जंजीर।

अर्थ :इस संसार में जो आये हैं वे सभी जायेंगे राजा, गरीब या bhikari। पर एक सिंहासन पर बैठ कर जायेगा और दूसरा जंजीर में बंध कर जायेगा। धर्मात्मा सिंहासन पर बैठ कर sawarg और पापी जंजीर में बाॅंध कर नरक ले जाया जायेगा।

अब तो जूझै ही बनै, मुरि चलै घर दूर। सिर सहिब को सौपते, सोंच ना किजैये सूर।

अर्थ : अब तो प्रभु प्राप्ति के yudh में जूझना ही उचित होगा-मुड़ कर जाने से घर बहुत दूर है। तुम अपने सिर-सर्वस्व का tyag प्रभु को समर्पित करो। एक वीर का यही कर्त्तव्य है।

ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस, भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस

अर्थ: कबीर संसारी जनों के लिए dukhit होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश pakad कर निकाल लेता |

ऐसी ठाठन ठाठिये, बहुरि ना येह तन होये। ज्ञान गुदरी ओढ़िये, काढ़ि ना सखि कोये।

अर्थ : ऐसा वेश रहन सहन रखें की पुनः यह शरीर ना हो। punerjanam न हो। तुम ज्ञान की गुदरी ओढ़ो जो तुम से कोई ले न सके छीन न सके।

Kabir das ke Dohe

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥

अर्थ: अगर अपने भाषा से अहं को हटा दिया जाए, तो दूसरों के साथ खुद को भी shanti मिलती है।

अजार धन अतीत का, गिरही करै आहार निशचय होयी दरीदरी, कहै कबीर विचार।

अर्थ : sanyasi को दान में प्राप्त धन यदि कोई गृहस्थ खाता है तो वह निश्चय ही दरिद्र हो जायेगा। ऐसा kabir का सुबिचारित मत है।

अंधे मिलि हाथी छुवा, अपने अपने ज्ञान। अपनी अपनी सब कहै, किस को दीजय कान।

अर्थ : अनेक अंधों ने हाथी को छू कर देखा और अपने अपने अनुभव का बखान किया। सब अपनी अपनी बातें कहने लगें-अब किसकी बात का Visvas किया जाये।

अंधो का हाथी सही, हाथ टटोल-टटोल। आंखो से नहीं देखिया, ताते विन-विन बोल।

अर्थ : वस्तुतः यह अंधों का हाथी है जो अंधेरे में अपने हाथों से टटोल कर उसे देख रहा है । वह अपने ankho से उसे नहीं देख रहा है और उसके बारे में अलग अलग बातें कह रहा है । अज्ञानी लोग ईश्वर का sampurn वर्णन करने में सक्षम नहीं है ।

अर्घ कपाले झूलता, सो दिन करले याद। जठरा सेती राखिया, नाहि पुरुष कर बाद।

अर्थ : तुम उस दिन को याद करो जब तुम सिर नीचे कर के झूल रहे थे। जिसने तुम्हें माॅं के garbh में पाला उस पुरुष-भगवान को मत भूलो। parmatma को सदा याद करते रहो।

अहिरन की चोरी करै, करै सुई की दान। उॅचे चढ़ि कर देखता, केतिक दूर बिमान।

अर्थ : लोग लोहे की चोरी करते हैं और sui का दान करते हैं। तब उॅंचे चढ़कर देखते हैं कि विमान कितनी दूर है। लोग jivan पर्यन्त पाप करते हैं और अल्प दान करके देखते हैं-सोंचते हैं कि उन्हें स्वर्ग ले जाने के लिये viman कितनी दूर पर है और कब ले जायेगा।

बाहर क्या दिखलाये , अंतर जपिए राम| कहा काज संसार से , तुझे धानी से काम |

अर्थ: बाहरी दिखावे कि जगह, मन ही मन में ram का नाम जपना चाहिए। संसार कि चिंता छोड़कर, sansar चलाने वाले पर ध्यान देना चाहिए।

Kabir ke Dohe Class 10

बाना देखि बंदिये, नहि करनी सो काम नीलकंठ किड़ा चुगै, दर्शन ही सो काम।

अर्थ : संत की वेश bhusa देख कर उन्हें प्रणाम करें। उनके कर्मों से हमारा कोई मतलब नहीं है। नीलकंठ पक्षी कीड़ा चुगता है। पर उसका दर्शन ही शुभ punye कारक होता है।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर । पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥

अर्थ: khajur का पेड़ न तो राही को छाया देता है, और न ही उसका फल आसानी से पाया जा सकता है। इसी तरह, उस shakti का कोई महत्व नहीं है, जो दूसरों के काम नहीं आ सकती।

बैरागी बिरकत भला, गिरा परा फल खाये सरिता को पानी पिये, गिरही द्वार ना जाये।

अर्थ : संसार की ichao से विरक्त संत अच्छे है जो जंगल के गिरे हुए फल खा कर एवं नदी का जल पीकर निर्वाह करते है। परंतु किसी गृहस्थ के द्वार पर kuch मांगने नहीं जाते है।

बेटा जाय क्या हुआ, कहा बजाबै थाल आवन जावन हवै रहा, ज्यों किरी का नाल।

अर्थ : पुत्र के जन्म से क्या हुआ? थाली पीट कर khushi क्यों मना रहे हो? इस जगत में आना जाना लगा ही रहता है जैसे की एक nali का kida पंक्ति बद्ध हो कर आजा जाता रहता है।

Kabir Ke Dohe

भक्ति दुहिली राम की, जस खाड़े की धार। जो डोलै सो कटि परै, निश्चल उतरै पार।

अर्थ : राम की भक्ति दुधारी talvar की तरह है। जो संसारिक वासना से चंचल मन वाला है, वह कट कर मर जायेगा पर स्थिर बुद्धि वाला इस भव sagar को पार कर जायेगा।

भक्ति दुवारा सांकरा, राई दसवै भाये। मन तो मैगल होये रहै, कैसे आबै जाये।

अर्थ : bhakti का द्वार अति संर्कीण है। यह राई के दसवें भाग के समान छोटा है। परंतु मन madmast हाथी की तरह है-यह कैसे उस द्वार से आना-जाना कर पायेगा।

भक्ति गेंद चैगान की, भाबै कोई लेजाये। कहै कबीर कछु भेद नहि, कहा रंक कह राये।

अर्थ : भक्ति चैराहे पर रखी गेंद के समान है जिसे वह अच्छा लगे उसे ले जा सकता है। kabir das कहते हैं कि इसमे अमीर-गरीब,उॅंच-नीच,स्त्री पुरुष,मुर्ख-ज्ञानी का कोई भेद नहीं है।

Kabir Ke Dohe in Hindi

भक्ति कठिन अति दुर्लभ है, भेस सुगम नित सोये। भक्ति जु न्यारी भेस से येह जाने सब कोये।

अर्थ : प्रभु भक्ति अत्यंत कठिन और दुर्लभ वस्तु है किंतु इसका भेष बना लेना अत्यंत saral कार्य है। भक्ति भेष बनाने से बहुत उत्तम है-इसे सब लोग अच्छी tareh जानते हैं।

भरा होये तो रीतै, रीता होये भराय। रीता भरा ना पाइये, अनुभव सोयी कहाय।

अर्थ : एक धनी निर्धन और निर्धन dhani हो सकता है। परंतु परमात्मा का निवास होने पर वह कभी पूर्ण भरा या खाली नहीं रहता। अनुभव यही कहता है। parmatma से पुर्ण हृदय कभी खाली नहीं-हमेशा पुर्ण ही रहता है।

भरम ना भागै जीव का, बहुतक धरिये भेश। सतगुरु मिलिया बाहिरे, अंतर रहा अलेख।

अर्थ : praniyo का भ्रम जब तक नही मिटता है-भलेही वह अनेक वेश भूषा रख ले-उसे ईश्वर की प्राप्ति वाह्य जगत में भले मिल जाये पर उसकी antratma खाली ही रह जाती है।

भीतर तो भेदा नहीं, बाहिर कथै अनेक। जो पाई भीतर लखि परै, भीतर बाहर एक।

अर्थ : हृदय में parmatma एक हैलेकिन बाहर लोग अनेक कहते है। यदि हृदय के अंदर परमात्मा का darshan को जाये तो वे बाहर भीतर सब जगह एक ही हो जाते है।

Kabir Das ke 5 Dohe

भेश देखि मत भुलिये, बुझि लिजिये ज्ञान। बिन कसौटी होत नहि, कंचन की पेहचान।

अर्थ : संत की वेश भूषा देख कर shankit मत हो। पहले उनके ज्ञान के संबंध में समझ बुझ लो सोने की पहचान बिना kasoti पर जाॅच किये नहीं हो सकती है।

भोग मोक्ष मांगो नहि, भक्ति दान हरि देव। और नहि कछु चाहिये, निश दिन तेरी सेव।

अर्थ : प्रभु मैं आप से किसी प्रकार भोग या moksh नही चाहता हॅू। मुझे आप भक्ति का दान देने की कृपा करैं। मुझे अन्य किसी चीज की इच्छा नहीं है। keval प्रतिदिन मैं आपकी सेवा करता रहूॅं।

भौसागर की तरास से, गुरु की पकरो बांहि। गुरु बिन कौन उबारसि, भौजाल धरा माहि।

अर्थ : इस संसार sagar के भय से त्राण के लिये तुम्हें गुरु की बांह पकड़नी होगी। तुम्हें गुरु के बिना इस संसार sagar के तेज धारा से बचने में और कोई सहायक नहीं हो सकता है।

भूला भसम रमाय के, मिटी ना मन की चाह। जो सिक्का नहि सांच का, तब लग जोगी नाहं।

अर्थ : अपने sarir में भस्म लगा कर जो भूल गया है पर जिसके मन की इच्छायें नहीं मिटी है-वह सच्चा sikka नहीं है वह वास्तव में योगी संत नहीं है।

Kabir Das Ji Ke Dohe

बोले बोल बिचारि के, बैठे ठौर सम्हारि। कहे कबीर ता दास को, कबहु ना आबै हारि।

अर्थ : खूब सोच समझ vichar कर बोलो और सही ढं़ग से उचित स्थान पर ही बैठो। kabir कहते है कि ऐसा व्यक्ति हार कर नहीं लौटता है।

बूझ सरीखी बात हैं, कहाॅ सरीखी नाहि। जेते ज्ञानी देखिये, तेते संसै माहि।

अर्थ : parmatma की बातें समझने की चीज है। यह कहने के लायक नहीं है। जितने budhiman ज्ञानी हैं वे सभी अत्यंत भ्रम में है।

बूँद पड़ी जो समुंदर में, जानत है सब कोय । समुंदर समाना बूँद में, बूझै बिरला कोय ॥

अर्थ: एक बूँद का सागर में समाना – यह समझना आसान है, लेकिन सागर का बूँद में समाना – इसकी kalpna करना बहुत कठिन है। इसी तरह, सिर्फ भक्त भगवान् में लीन नहीं होते, कभी-कभी bhagwan भी भक्त में समा सकते हैं।

Kabir Ji Ke Dohe

चाकी चली गुपाल की, सब जग पीसा झार। रुरा सब्द कबीर का, डारा पात उखार।

अर्थ : परमात्मा के चलती chakki में संसार के सभी लोग पिस रहे है। लेकिन kabir का प्रवचन बहुत ताकतवर है। जो भ्रम और माया के पाट पर्दा को ही उघार देता है और Mohmaya से लोगो की रक्षा हो जाती है|

चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहाबै हंस। ते मुक्ता कैसे चुगे, परे काल की फांस।

अर्थ : जिसका चाल चलन bugle की तरह छल कपट वाला है लेकिन संसार की नजर में वह हंस जैसा acha कहलाता है-वह मुक्ति का moti नहीं चुग सकता है। वह मृत्यु के फांस में अवश्य गिरेगा।

चार च्ंन्ह हरि भक्ति के, परगट देखै देत। दया धरम आधीनता, पर दुख को हरि लेत।

अर्थ : प्रभु के भक्ति के चार lakshn हैं जो स्पष्टतः दिखाई देते हैं। दया,र्धम,गुरु एंव ईश्वर की adhinta तथ् दुख का तरता- तब प्रभु उसे अपना लेते है।

चंदन जैसे संत है, सरुप जैसे संसार। वाके अंग लपटा रहै, भागै नहीं बिकार।

अर्थ : संत चंदन की bhati होते है और यह संसार साॅंप की तरह विषैला है। किंतु साॅंप यदि संत के sarir में बहुत दिनों तक लिपटा रहे तब भी साॅंप का विष-विकार samapt नहीं होता है।

Kabir das Ke Dohe

चहुॅ दिस ठाढ़े सूरमा, हाथ लिये हथियार। सब ही येह तन देखता, काल ले गया मार।

अर्थ : चारों दिशाओं में वीर हाथों में hatiyar लेकर खड़े थे। सब लोग अपने शरीर पर garv कर रहे थे परंतु मृत्यु एक ही चोट में शरीर को मार कर ले गये।

चली जो पुतली लौन की, थाह सिंधु का लेन । आपहू गली पानी भई, उलटी काहे को बैन ॥

अर्थ: जब नमक sagar की गहराई मापने गया, तो खुद ही उस खारे पानी मे मिल गया। इस उदाहरण से कबीर bhagwan की विशालता को दर्शाते हैं। जब कोई Sachi आस्था से भगवान् खोजता है, तो वह खुद ही उसमे समा जाता है।

चलो चलो सब कोये कहै, पहुचै बिरला कोये। ऐक कनक औरु कामिनि, दुरगम घाटी दोये।

अर्थ : parmatma तक जाने के लिये सभी चलो-चलो कहते है पर वहाॅ तक शायद ही कोई पहूॅच पाता है। धन और स्त्री रुपी दो अत्यंत खतरनाक बीहड़ घाटियों को पार कर के ही कोई Parmatma की शरण में पहूॅच सकता है।

चलती चाकी देखि के, दिया कबीरा रोये। दो पाटन बिच आये के, साबुत गया ना कोये।

अर्थ : चलती चक्की को देखकर kabir रोने लगे। चक्की के दो पथ्थरों के बीच कोई भी pisne से नहीं बच पाया। संसार के जन्म मरण रुपी दो चक्को के बीच कोई भी jivit नहीं रह सकता है।

निष्कर्ष।

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